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History of Medieval India-Delhi Sultanate-मध्यकालीन भारत का इतिहास-दिल्ली सल्तनत
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गुलाम वंश (1206-90 ई.)-Ghulam Vansh
1163 ई. में गयासुद्दीन मुहम्मद को गोर की राजगद्दी प्राप्त हुई। तुर्की जनजातीय परम्परा का पालन करते हुए उसने अपने छोटे भाई मुइजुद्दीन मुहम्मद गौरी को गजनी प्रदेश का शासक नियुक्त किया। उसने 1173-1206 ई. तक शासन किया। कुतुबुद्दीन ऐबक मुहम्मद गोरी का दास था।
गोरी ने उसे 1192 ई. में भारतीय प्रदेश का प्रशासक नियुक्त किया था। क्योंकि गोरी का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। अत: भारतीय क्षेत्र का नियन्त्रण उसे ही प्राप्त हो गया। याल्दोज नामक दास का नियन्त्रण गजनी पर हो गया तथा कुवाचा उच्छ पर स्थापित हो गया। इस कारण इस वंश को गुलाम वंश की संज्ञा दी गई। मिमामी
दाम कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210 ई.)
ऐबक एक तुर्की शब्द है, जिसका अर्थ होता है, चन्द्रमा का देवता। ऐबक 1206 ई. में भारतीय प्रदेश का शासक हुआ। 1208 ई. में उसे मुहम्मद गौरी के गजनी के साम्राज्य के उत्तराधिकारी महमूद से दास मुक्ति पत्र प्राप्त हुआ, जो ऐबक के वैध सुल्तान बनने के लिए आवश्यक था।
सिंहासन पर बैठने पर उसने सुल्तान की उपाधि नहीं ग्रहण की, बल्कि केवल मलिक और सिपहसालार की पदवियों से ही सन्तुष्ट रहा। उसमें हसन फक्र-ए-मुदव्बिर को संरक्षण दिया वह लाखों में दान दिया करता था तथा अपनी असीम उदारता के लिए उसे लाखबख्श कहा गया।
निजामी और ऐबक ने न तो अपने नाम का खुतबा पढ़वाया और न ही अपने नाम के सिक्के चलाए। ऐबक ने 1206 से 1210 ई. तक लगातार लाहौर को ही अपनी राजधानी बनाए रखा।
उसने प्रसिद्ध सूफी सन्त 'ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी' के नाम पर दिल्ली में कुतुबमीनार की नींव रखी, जिसे इल्तुतमिश ने पूरा किया।
1210 ई. में चौगान खेलते समय घोड़े से गिर जाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई। कुतुबुद्दीन का उत्तराधिकारी उसका अनुभवहीन व अयोग्य पुत्र आरामशाह था, इल्तुतमिश ने इसे अपदस्थ करके सिंहासन पर अधिकार किन्तु कर लिया।
इल्तुतमिश (1210-1236 ई.)
इल्तुतमिश का अर्थ होता है, ‘साम्राज्य का रक्षक'। ऐबक की मृत्यु के समय इल्तुतमिश बदायूँ का सूबेदार (गवर्नर) था। वह ऐबक का दास तथा दामाद था। 1197 ई. में अन्हिलवाडा के युद्ध के पश्चात् उसे ऐबक ने खरीदा था।
इल्तुतमिश ही दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक था।
इल्तुतमिश ने सुल्तान के पद को वंशानुगत बनाया। मुहम्मद गौरी ने 1206 ई. में खोखरों के विद्रोह के समय इल्तुतमिश की असाधारण योग्यता के कारण ही उसे दासता से मुक्त कर दिया था।
1229 ई. में उसे बगदाद के अब्बासी खलीफा से मान्यता का अधिकार पत्र प्राप्त हुआ, जिससे सुल्तान के रूप में उसकी स्वतन्त्र स्थिति एवं दिल्ली सल्तनत को औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई। इल्तुतमिश ने इक्ता संस्था का प्रयोग भारतीय समाज की सामन्तवादी व्यवस्था को समाप्त करने तथा साम्राज्य के दूरस्थ भागों को केन्द्र के साथ संयुक्त करने के एक साधन के रूप में प्रयुक्त किया
आरम्भिक समस्याएँ एवं उनके समाधान
विरोधी सरदारों (यल्दूज एवं कुवाचा) को परास्त कर इल्तुतमिश ने अपने वफादार गुलाम अमीरों (सरदारों) की एक टुकड़ी रखी, जिसे तुर्कान-ए-चहलगनी या चालीसा (चालीस अमीरों का समूह) कहा जाता था।
ख्वारिज्म के अन्तिम शाह जलालुद्दीन माँगबरनी का पीछा करते हुए 1212 ई. में चंगेज खाँ सिन्ध तक पहुँचा गया। (१ जलालुद्दीन ने इल्तुतमिश से शरण माँगी, जिसे इल्तुतमिश ने अस्वीकार कर दिया और इस प्रकार नवोदित तुर्की साम्राज्य को उसने मंगोल आक्रमण से बचा लिया।
1230-31 ई. में इल्तुतमिश ने बंगाल पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया। 1233-34 ई. में कालिंजर को सफलतापूर्वक लूटा इसने सिक्कों पर कसान
सल्तन सल्तनत युग के दो महत्त्वपूर्ण सिक्के चाँदी का टका और तांबे का जीतल उसी ने आरम्भ किए।
(4 ग्वालियर की विजय के बाद इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया का नाम सिक्कों पर अंकित करवाया। उसने अपने उत्तराधिकारी के रूप में ज्येष्ठ पुत्र का चयन करने की सामान्य प्रथा को तोड़ दिया और अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उसने लाहौर के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया।
सांस्कृतिक योगदान
इल्तुतमिश ने विद्वानों को संरक्षण देकर सल्तनत की सांस्कृतिक विरासत को निर्मित करने का प्रयास किया, उसके दरबार में मिनहाज-उस-सीराज एवं मलिक ताजुद्दीन जैसे विद्वान निवास करते थे। 6
इल्तुतमिश ने बदायूँ में हौजशम्शी तथा जोधपुर में अतारकिन का दरवाजा, निर्मित किया। उसने अपने पुत्र नसीरूद्दीन की स्मृति में सुल्तानगढ़ी का मकबरा निर्मित किया। इसके अतिरिक्त उसने मुहम्मद गौरी की स्मृति में मदरसा-ए-मुइज्जी तथा अपने पुत्र की स्मृति में नासिरी मदरसा निर्मित किया।
भारत में सम्भवत: पहला मकबरा निर्मित करवाने का श्रेय भी इल्तुतमिश को दिया जाता है। अजमेर की मस्जिद का निर्माण इल्तुतमिश ने ही करवाया था। इल्तुतमिश का मकबरा कुतुबमीनार परिसर दिल्ली में है।
रुकनुद्दीन के समय में इल्तुतमिश की माँ शाहतुर्कान के हाथ में वास्तविक सता थी, जी अति महत्वाकांक्षी और निर्दयी महिला थी। इसे जन समूह द्वारा अपदस्थ कर रजिया को सुल्तान बनाया गया।
रजिया सुल्तान (1236-1240 ई.)
रजिया 1236 ई. में सुल्तान बनी। यहाँ दो महत्त्वपूर्ण तथ्य दृष्टव्य हैं। पहली बार दिल्ली की जनता ने उत्तराधिकार के प्रश्न पर स्वयं निर्णय लिया था तथा वह भारत की प्रथम मुस्लिम शासिका थी। उसका विरोध प्रसिद्ध तुर्क अमीरों ने किया, जिनमें निजाम-उल-मुल्क जुनैदी, मलिक अलाउद्दीन जानी, मलिक सैफुद्दीन कूची, कबीर खाँ-अयाज और मलिक ईजुद्दीन सलपरी प्रमुख थे। --
महान् शासक के सभी गुण मौजूद थे, परन्तु उसमें एक ही दुर्गुण था और वह Read
सुल्तान की शक्ति एवं सम्मान में वृद्धि करने के लिए रजिया ने पर्दा प्रथा का त्याग किया और वह पुरुषों के समान कुबा (कोट) और कुलाह (टोपी) पहनकर दरबार में बैठती थी तथा शासन का कार्य वह स्वयं सम्भालती थी। .
एतगीन को रजिया ने बदायूँ का अक्तादार और फिर अमीर हाजिब का महत्त्वपूर्ण पद तथा अल्तूनिया को सरहिन्द (भटिण्डा) का अक्तादार नियुक्त किया। एक अबीसीनियाई हब्शी अफसर जलालुद्दीन याकूत जिसके प्रति वह विशेष अनुराग रखती थी, को अमीर-ए-आखूर (अश्वशाला का प्रधान) नियुक्त किया।
1240 ई. में सरहिन्द के सूबेदार अल्तूनिया ने विद्रोह कर दिया। रजिया ने अल्तूनिया से विवाह कर लिया। अमीरों ने रजिया के भाई बहरामशाह को दिल्ली की गद्दी पर बैठाया। दोनों दिल्ली की ओर बढ़े, किन्तु वह बहरामशाह द्वारा पराजित हुई तथा 13 अक्टूबर, 1240 में उसकी हत्या कर दी गई।
रजिया के पतन के दो कारण थे-तुर्की अमीरों की ईर्ष्या तथा उसका स्त्री होना, जैसा कि मिन्हास-उस-सिराज का मानना है कि रजिया के व्यक्तित्व में था उसका औरत होना।
मुइजुद्दीन बहरामशाह (1240-42 ई.)
इसके शासनकाल का सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य नवीन पद नायब या मायब-ए-ममलिकात का सृजन होना था। इसके द्वारा सुल्तान से -एशासन की वास्तविक शक्ति नायब के पास आ गई। सर्वप्रथम यह
पद (नायब) रजिया के विरुद्ध षड्यन्त्र करने वाले एक नेता एतगीन को मिला। इस प्रकार वास्तविक शक्ति व सत्ता के अब तीन दावेदार थे. सुल्तान, नायब और वजीर।
1241 ई. में तायर बहादुर के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण हुआ, उसी बहाने एकत्रित तुर्की सरदारों की सेना ने बहरामशाह को 1242 ई. में पराजित कर वध कर दिया।
अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-1246 ई.)
मसूदशाह, इल्तुतमिश के पुत्र सुल्तान रुकनुद्दीन फिरोजशाह का पुत्र था। इसके समय नायब का पद कुतुबुद्दीन हसन गौरी को दिया गया, जो रजिया के समय नायब-ए-लश्कर के पद पर था। इसके समय बलबन की शक्ति में काफी वृद्धि हुई, उसे अमीर-ए-हाजिय का पद प्राप्त हुआ।
नासिरुद्दीन महमूद (1246-1265 ई.)
नासिरुद्दीन के काल में कुछ थोड़े से समय को छोड़कर शासन सत्ता पूर्णतया उसके नायब बलबन के हाथों में रही। 1249 ई. में उसने बलबन को 'उलूग खाँ' की उपाधि प्रदान की और सेना पर पूर्ण नियन्त्रण के साथ नायब-ए-ममलिकात' का पद दिया। प्रद .
इसके काल में भारतीय मुसलमानों का एक अलग दल बन गया था, जो बलबन का विरोधी था। इसका नेता इमादुद्दीन रिहान था) मिनहाजुद्दीन सिराज की तबकाते नासिरी इसे ही समर्पित है)
1265 ई. में नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु होने पर बलबन ने स्वयं को सुल्तान घोषित किया तथा उसका उत्तराधिकारी बना।
बलबन (1265-1287 ई.)
बलबन इल्तुतमिश का दास था। वह इल्वरी तुर्क था। यद्यपि बचपन में ही मंगोलों ने उसे दास के रूप में बेच दिया था। बलबन का मूल नाम बहाऊद्दीन था।
बलबन दिल्ली सल्तनत का एक ऐसा व्यक्ति था, जो सुल्तान न होते हुए भी सुल्तान के छत्र का उपयोग करता था। वह पहला शासक था. जिसने सुल्तान के पद और अधिकारों के बारे में विस्तृत रूप से विचार प्रकट किए। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा को स्थापित करने के लिए रक्त एवं लौह की नीति अपनाई।
बलबन का वाजत्व सिद्धान्त
बलबन के अनुसार, "सुल्तान पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है और उसका स्थान केवल पैगम्बर के पश्चात है।'' बलबन ने अपने को फिरदौसी के शाहनामा ) में वर्णित अफरासियाब वंशज) से सम्बद्ध किया तथा शासन को ईरानी आदर्श के रूप में सुव्यवस्थित किया।
बलबन के राजत्व सिद्धान्त की दो मुख्य विशेषताएँ थीं-
- सुल्तान का पद ईश्वर के द्वारा प्रदान किया हुआ होता है।
- सुल्तान का निरंकुश होना आवश्यक है।
बलबन ने चालीसा दल का दमन किया, बलबन के शासन की सफलता का मुख्य श्रेय उसका गुप्तचर विभाग था) मंगोलों का मुकाबला करने के लिए उसने सैन्य विभाग दीवाने अर्ज की स्थापूना की। बलबन के समय दिल्ली का कोतवाल फखरूद्दीन था।
उसने सिजदा और पायबोस की प्रथा को अपने दरबार में शुरू करवाया, जो मूलत: ईरानी थी और जिन्हें गैर-इस्लामी समझा जाता था। इसके अतिरिक्त उसने ईरानी त्योहार नौरोज प्रथा भी आरम्भ की।
1279 ई. में बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ ने विद्रोह किया। तुगरिल ने मुगीसुद्दीन की उपाधि ग्रहण की और अपने नाम के सिक्के चलाए तथा खुतबा पढ़वाया। बाद में बलबन ने विद्रोह को दबाया तथा विद्रोहियों को मृत्युदण्ड दिया।
उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर मंगोलों के आक्रमण से बचने के लिए उसने एक दुर्ग श्रृंखला का निर्माण कराया तथा अपने ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा मोहम्मद को वहाँ का शासन सौंपा, किन्तु मंगोलों (तमर) के एक प्रबल आक्रमण का सामना करते हुए शाहजादा मोहम्मद मारा गया।
बलबन की मृत्यु के बाद उसका पौत्र कैकुबाद उसका उत्तराधिकारी हुआ, जो एक अत्यन्त विलासी एवं कामुक व्यक्ति था। अमीरों के एक गुट के नेता आरिज-ए-मुमालिक मलिक फिरोज (जलालुद्दीन) कैकुबाद की हत्या करके राजगद्दी पर बैठा। इस प्रकार दिल्ली सल्तनत में मामलूक वंश अर्थात् गुलाम वंश का अन्त हो गया।
खिलजी वंश (1290-1320 ई.)-Khilaji Vansh
खिलजी वंश की स्थापना जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी ने की थी। इस वंश के कुल चार शासकों (जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक शाह व नासिरुद्दीन खुसरो शाह) ने 1290 ई. से 1320 ई. तक अर्थात् 30 वर्षों तक शासन किया। खिलजियों के हाथ में सत्ता आने से सत्ता में कुलीन तन्त्र का अन्त हो गया तथा सत्ता कुलीन तुर्कों के हाथों से निकलकर (निम्नवर्गीय तुर्कों, अफगानों व हिन्दुस्तानी मुसलमानों के हाथ में आ गई। इसी कारण खिलजी वंश की स्थापना खिलजी क्रान्ति के नाम से भी प्रसिद्ध है। नोवा
जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (1290-96 ई.)
जलालुद्दीन ने अपनी योग्यता से एक सैनिक के स्तर से उठते हुए सर-ए-जाँदार (शाही अंगरक्षक) के पद को प्राप्त किया। बाद में वह समाना का गवर्नर बना दिया गया। मिंगोल आक्रमण का सफलतापूर्वक सामना करने के बाद कैकुबाद ने उसे (दिल्ली बुलाकर शाइस्ता खाँ की उपाधि दी तथा आरिज-ए-मुमालिक (सेना मन्त्री) का पद भी दिया।
कैकुबाद द्वारा बनवाए गए अपूर्ण किलोखरी (कूलागढ़ी) के महल में जलालुद्दीन ने अपना राज्याभिषेक करवाया।
जलालुद्दीन ने तुर्को, गैर-तुर्कों और भारतीय मुसलमानों को शासन में सम्मिलित करके भारत के मुसलमानी राज्य को एक विस्तृत आधार प्रदान करने का प्रयत्न किया।
जलालुद्दीन के समय 1292 ई. में अब्दुल्ला के नेतृत्व में मंगोलों ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया तथा सुनाम तक पहुँच गए। जलालुद्दीन ने कार्यवाही करते हुए उसे सिन्धु नदी के तट पर परास्त किया। इस पराजय के पश्चात् चंगेज खाँ के एक वंशज उलुग ने अपने 4000 समर्थकों के साथ इस्लाम स्वीकार कर भारत में ही रहने का निश्चय किया। इनको नवीन मुसलमान कहा गया
1296 ई. में अलाउद्दीन ने सुल्तान की अनुमति के बगैर दक्षिण भारत स्थित देवगिरी पर आक्रमण किया। वहाँ का शासक रामचन्द्रदेव पराजित हुआ। जलालुद्दीन की अनुमति से 1292 ई. में मालवा स्थित भिलसा पर अलाउद्दीन ने आक्रमण किया। इससे प्रसन्न होकर सुल्तान ने उसे अवध की सूबेदारी भी प्रदान की। उसी के समय में ईरानी फकीर सीदी मौला को हाथी के पैरों तले कुचला गया था।(4)
19 जुलाई, 1296 को जलालुद्दीन अपने भतीजे अलाउद्दीन से सु मिलने और बधाई देने (देवगिरी आक्रमण के पश्चात्) कड़ा गया। वहाँ उसके भतीजे द्वारा छलपूर्वक सुल्तान का वध कर दिया गया।
अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.)
अलाउद्दीन का बचपन का नाम अली गुरशास्प था, उसने खलीफा की सत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए ('यामिन-उल-खिलाफत-नासिरी-अमीर-उल मोमिनीन' की उपाधि धारण की।
मुस्तान बनने के पश्चात् अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम पूर्व सुल्तान के पुत्र अर्कली खाँ सहित उसके परिवार के समस्त सदस्यों का कत्ले-आम किया। तदुपरान्त उसने बलबनी और जलाली अमीरों को जड़-मूल सहित नष्ट कर दिया।
अलाउद्दीन के राज्यारोहण के साथ ही सत साम्राज्यवादी युग का सूत्रपात होता है। वह प्रारम्भ से ही 2साहसी एवं महत्त्वाकांक्षी था। जब वह कड़ा का सूबेदार था, सा तभी उसने 1292 ई. में मालवा पर आक्रमण कर भिलसा नगर को लूटा तथा अपार सम्पत्ति एकत्रित कर ली।
उसने अपना राज्याभिषेक दिल्ली में बलबन के लालमहल में 10 करवाया। अलाउद्दीन के समकालीन अमीर खुसरो और उसके परवर्ती इसामी दोनों ने उसे 'एक भाग्यवादी व्यक्ति कहा है।
राजपूताना, यादव, होयसल व काकतीय राज्य इसके करद राज्य थे। गुजरात सल्तनत का एक प्रान्त था। 1298 ई. में खिलजी सेना ने गुजरात के शासक कर्ण की सम्पत्ति तथा उसकी पत्नी कमला देवी को दिल्ली भेजा था। कमला देवी से अलाउद्दीन ने बाद में विवाह कर लिया।
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मंगोलों के सर्वाधिक आक्रमण हुए। इन अनवरत युद्धों से अलाउद्दीन ने अपनी सल्तनत का प्रभावशाली विस्तार किया। उत्तर भारत में आधुनिक पंजाब, सिन्ध और उत्तर प्रदेश केन्द्रीय शासन के सीधे नियन्त्रण में थे। .
पाण्ड्य राजाओं ने अलाउद्दीन का कभी आधिपत्य स्वीकार नहीं किया और न ही कोई कर दिया। बिहार, बंगाल, उड़ीसा कश्मीर आदि प्रान्त दिल्ली सल्तनत से स्वतन्त्र थे। अधिकांश मध्य भारत जिसमें चन्देरी, एलिचपुर, उज्जैन और माण्डू जैसे महत्त्वपूर्ण स्थान थे, केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त प्रान्तपतियों के सीधे नियन्त्रण में थे।
गुजरात विजय के दौरान नुसरत खाँ ने मलिक काफूर को एक हजार दीनार में खरीदा था, इसलिए मलिक काफूर को हजार दीनारी भी कहा जाता था। नुसरत खाँ ने उसे खरीदकर 1299 ई. में गुजरात विजय से वापस आने पर सुल्तान अलाउद्दीन के समक्ष तोहफे के रूप में प्रस्तुत किया। शीघ्र ही वह सुल्तान अलाउद्दीन के काफी नजदीक आ गया और 1307 ई. में सुल्तान ने ने उसे दिल्ली सल्तनत का मलिक नाइब बना दिया। उसने सफलतापूर्वक खिलजी सेना का नेतृत्व करते हुऐ देवगिरी वारंगल, द्वारसमुद्र, मालाबार एवं मदुरै को जीतकर दिल्ली सल्तनत के अधीन कर दिया। 1303 ई. में चित्तौड़ विजय अलाउद्दीन की एक नवीन विजय थी। इसके पूर्व 11303 ई. में चित्तौड़ विजय अलाउद्दीन इसे किसी सुल्तान ने नहीं जीता था। उसने चित्तौड़ का नाम अपने पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर खिज्राबाद रखा। इस अभियान में अमीर खुसरो ने भी हिस्सा लिया। चित्तौड़ का राजा रतन सिंह था। गौरा एवं बादल की कहानी इसी अभियान से जुड़ी है।
तेलंगाना पर आक्रमण के समय ही वहाँ के शासक प्रताप रूद्रदेव ने मलिक काफूर को कोहिनूर हीरा दिया था।
अलाउद्दीन ने सिकन्दर या(द्वितीय) की उपाधि धारण की थी।
देवगिरी नरेश रामचन्द्र और होयसल नरेश वल्लालदेव अलाउद्दीन के दरबार में आए थे। वल्लालदेव ने अलाउद्दीन को एक विशेष खिलअत, एक मुकुट और छत्र तथा दस लाख टंको की थैली भेंट स्वरूप दी।
विद्रोह-
अलाउद्दीन के काल में बहुत-से विद्रोह हुए थे; जैसे-अकत खाँ, मलिक उमर, मंगू खान, हाजी मौला तथा नवीन मुसलमानों द्वारा आदि। इनमें पहला विद्रोह नवीन मुसलमानों का था। इसके समय मंगोलों ने कई बार आक्रमण किए। आक्रमण के दौरान महत्त्वपूर्ण सेनापति जफर खाँ मारा गया।
राज्य के विद्रोह के दमन के लिए उसने चार अध्यादेश जारी किए-
- अमीर वर्ग की सम्पत्ति (भूमि) जब्त कर उसे खालसा कृषि योग्य भूमि बनाकर राजस्व में वृद्धि की।
- गुप्तचर प्रणाली का गठन किया।
- दिल्ली में मद्य निषेध कर दिया।
- अमीरों के परस्पर मेल-मिलाप और उनके उत्सवों /समारोहों पर रोक लगा दी।
अलाउद्दीन के सुधार-
अलाउद्दीन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसने राजनीति को धर्म से कभी प्रभावित नहीं होने दिया। उसने खलीफा की सत्ता को मान्यता दी, लेकिन प्रशासन में उनके हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया। उसने यामीन-उल-खिलाफत नासिरी-अमीर-उल मुमनिन (खलीफा का नायब) की उपाधि ग्रहण की। वह निरंकुश राजतन्त्र में विश्वास करता था।
खजाइनुल फुतूह में अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन को विश्व का सुल्तान, पृथ्वी के शासकों का सुल्तान, युग का विजेता, जनता का चरवाहा जैसी उपाधियों से विभूषित किया।
अलाउद्दीन ने गुप्तचर पद्धति को पूर्णतया संगठित किया। इस विभाग का मुख्य अधिकारी रीद-ए-मुमालिक था। उसके अन्तर्गत अनेक वरीद (सन्देशवाहक या हरकारे) थे। वरीद के अतिरिक्त अलाउद्दीन ने अनेक सूचनादाता नियुक्त किए, जो मुनहियन या मुन्ही कहलाते थे।
अलाउद्दीन ने सेना का केन्द्रीकरण किया। उसने स्थायी सेना के गठन हेतु सीधी भर्ती की और केन्द्रीय कोषागार से सैनिकों को नकद वेतन देना प्रारम्भ किया। किलों या दुर्गों में अनुभवी तथा विवेकशील सेनानायक नियुक्त किए जाते थे, जिन्हें कोतवाल कहा जाता था।
अलाउद्दीन ने घोड़ों को दागने एवं सैनिकों के हुलिया लिखे जाने के विषय में नवीनतम नियम बनाए। स्थायी सेना को गठित करने वाला अलाउद्दीन पहला सुल्तान था।
सेना की इकाइयों का विभाजन हजार, सौ और दस पर आधारित था, जो खानों, मलिकों, सिपहसालारो इत्यादि के अन्तर्गत थे। दस हजार की सैनिक टुकड़ियों को तुमन कहा जाता था। निरीक्षण करके नियुक्त किए गए सैनिकों को सरकारी भाषा में मुर्रत्तब कहा जाता था।
बाजार सुधार
एक विशाल सेना के रख-रखाव को देखते हुए अलाउद्दीन ने आर्थिक सुधार लागू किए। अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार नियन्त्रण के बारे में विस्तृत जानकारी तारीख-ए-फिरोजशाही (बरनी) से मिलती है, इसके अलावा अमीर खुसरो के खजाइनुल फुतूह, इसामी की फुतूहसलातीन तथा इब्नबतूता के रेहला नामक ग्रन्थ से भी इस बारे में जानकारी मिलती है।
अलाउद्दीन ने राजधानी के आर्थिक मामलों की देख-रेख के लिए दीवान-ए-रियासत नामक एक नवीन विभाग की स्थापना की। दीवान-ए-रियासत व्यापारी वर्ग पर नियन्त्रण रखता था। वह बाजारो पर भी नियन्त्रण रखता था और नाप-तौल का निरीक्षण भी करता था उसने राशनिंग प्रणाली भी शुरू की।
कुतुबुद्दीन मुबारक शाह खिलजी (1316-1320 ई.)
इसने स्वयं को खलीफा घोषित किया (ऐसा करने वाला सल्तनत का प्रथम शासक था) और अलइमाम, उल इमाम (उल वासिक विल्लाह), खिलाफत-उल-लह आदि उपाधि ग्रहण की। कभी-कभी वह राज दरबार में स्त्रियों के वस्त्र पहनकर आ जाता था। बरनी के अनुसार मुबारक कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था।
खुसरो शाह (1320 ई.)
मुबारक शाह के पश्चात् खुसरोशाह (1320 ई.) शासक बना। वह प्रथम भारतीय मुसलमान था, जो दिल्ली का शासक बना। नासिरुद्दीन खुसरो शाह हिन्दू धर्म से परिवर्तित मुसलमान था। उसने पैगम्बर के सेनापति की उपाधि ग्रहण की। उसके शत्रुओं ने उसके विरुद्ध इस्लाम का शत्रु और इस्लाम खतरे में है, के नारे लगाए। इसने अपने नाम के खुतबे पढ़वाए।
तुगलक वंश (1320-1414ई.)-Tuglaq Vansh
तुगलक वंश की स्थापना गयासुद्दीन तुगलक ने की थी। इस वंश में कुल आठ शासक हुए। इन आठ शासकों ने 1320 ई. से 1414 ई. तक अर्थात् 94 वर्षों तक शासन किया। दिल्ली सल्तनत के काल में तुगलक वंश के शासकों ने सबसे अधिक समय तक शासन किया। दिल्ली पर शासन करने वाले तुर्क राजवंशों में अन्तिम तुगलक वंश था।
गयासुद्दीन तुगलक (1320-1325 ई.)
गयासुद्दीन का मूल नाम गाजी तुगलक अथवा गाजी बेग तुगलक था। इब्नबतूता के अनुसार वह तुर्कों की करौना शाखा से सम्बन्धित था।
गयासुद्दीन तुगलक काफी प्रतिभाशाली था। मंगोल आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना करने के कारण अलाउद्दीन खिलजी ने उसे दीपालपुर का गवर्नर बना दिया था।
राज्य की आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए लगान व्यवस्था को पुनर्व्यवस्थित किया। अलाउद्दीन खिलजी द्वारा लागू की गई भूमि लगान तथा बाजार व्यवस्था को त्याग दिया खुत, मुकद्दम, चौधरी को भी कुछ रिसायतें दी गईं। लगान निश्चित करने में बटाई का प्रयोग फिर से प्रारम्भ कर दिया, ऋणों की वसूली बन्द करवा दी, भू-राजस्व की की दा को 1/3 किया।
उसने कृषि में उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए नहर सिंचाई पद्धति को प्रोत्साहन दिया। वह प्रथम सुल्तान था जिसने नहर का निर्माण करवाया। साथ-ही-साथ डाक व्यवस्था को व्यवस्थित किया। इसके लिए प्रत्येक 3/4
मील पर डाक लाने वाले कर्मचारी अथवा घुड़सवार नियुक्त किए। | लिया। तेलंगाना का नाम सुल्तानपुर रखा गया। तुगलकाबाद शहर की नींव डाली।
अलाउद्दीन द्वारा चलाई गई दाग तथा चेहरा प्रथा को प्रभावशाली ढंग तथा उत्साह से लागू किया गया। 1323 ई. में उसने शाहजादे जौना खाँ (मोहम्मद बिन तुगलक) को दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुनर्स्थापना के लिए भेजा। जौना खाँ ने वारंगल के काकतीय एवं मदुरा के पाण्ड्य राज्यों को विजित कर उसे दिल्ली सल्तनत में शामिल कर
राजमुन्दरी के अभिलेखों में जौना खाँ (उलूग खाँ) को दुनिया का खान कहा जाता है। सर्वप्रथम गयासुद्दीन तुगलक के समय में ही दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया गया। इसमें सर्वप्रथम वारंगल था।
बंगाल के अभियान से लौटते समय स्वागत समारोह के लिए निर्मित लकड़ी के भवन (तुगलकाबाद के समीप अफगानपुर गाँव) के गिरने से 1325 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। तुगलकाबाद (दिल्ली के समीप) में उसे दफनाया गया। निजामुद्दीन औलिया ने गयासुद्दीन तुगलक के विषय में कहा था कि 'हनूज दिल्ली दूर अस्त' अर्थात् 'हुजूर, दिल्ली अभी दूर है'।
मोहम्मद बिन तुगलक (1325-51 ई.)
गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जौना खाँ, मोहम्मद बिन तुगलक के नाम से 1325 ई. में सुल्तान बना। दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में मोहम्मद बिन तुगलक सर्वाधिक विलक्षण व्यक्तित्व वाला शासक भी था। वह अरबी एवं फारसी का महान् विद्वान् तथा ज्ञान-विज्ञान विधाओं; जैसे-खगोलशास्त्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा विज्ञान, की विभिन्न तर्कशास्त्र आदि में पारंगत था।
मोहम्मद बिन तुगलक ने 200 ग्रेन का एक सोने का सिक्का दीनार तथा उसने 140 ग्रेन का एक चाँदी का सिक्का चलाया, जिसे अदली कहा जाता था। वह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था, जिसने कृषि भूमि के आकलन के लिए एक रजिस्टर तैयार करवाया।
उसके शासनकाल में 1333 ई. में मोरक्को का यात्री इब्नबतूता भारत आया था। सुल्तान ने उसका खूब स्वागत किया तथा दिल्ली का काजी नियुक्त किया। 1342 ई. में इब्नबतूता सुल्तान के राजदूत की हैसियत से चीनी शासक तोगन तिमूर के दरबार में गया। इस यात्री ने मोहम्मद तुगलक के समय की घटनाओं का अपनी पुस्तक रेहला में उल्लेख किया है।
मोहम्मद बिन तुगलक की विभिन्न योजनाएँ
दोआब में कर वृद्धि (1325 ई.)
मोहम्मद तुगलक ने अपने शासन काल के आरम्भ में दोआब में कर वृद्धि की जो कुल उपज का 50% तक थी। बरनी के अनुसार यह वृद्धि दस या बीस गुना थी, जबकि फरिश्ता के अनुसार, यह तीन से चार गुना अधिक थी(वह कृषि में शस्यावर्तन प्रणाली लागू करने वाला प्रथम शासक था।
राजधानी परिवर्तन (1327 ई.)
मोहम्मद बिन तुगलक ने अपनी राजधानी को दिल्ली से हटाकर दौलताबाद में स्थापित किया दौलताबाद मूल रूप से देवगिरि था, जिसको मुबारक खिलजी के काल में कुतुबाबाद कहा जाता था। देवगिरी को कुतबुल इस्लाम भी कहा गया है। तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार दिल्ली की समस्त जनता को दौलताबाद जाने के आदेश दिए गए और दिल्ली उजाड़ हो गई।
• 1335 ई. में पुन: दिल्ली को ही राजधानी बनाया गया।
सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन (1329 ई.)
मोहम्मद बिन तुगलक ने आर्थिक व्यवस्था में नया प्रयोग करते हुए सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन किया। इसके लिए उसने चाँदी के टंका के स्थान पर काँसे के बए सिक्के चलाए तथा उनका मूल्य टंका के बराबर घोषित कर दिया।/तुगलक से पूर्व इस सांकेतिक मुद्रा का चीन के कुबलई खाँ तथा ईरान के कैरवतू ऐसा प्रयोग कर चुके थे और उन्होंने कागज की मुद्रा को अपनाया था।
मोहम्मद तुगलक की यह योजना असफल रही, क्योंकि उसने नकली मुद्रा बाजार को नियन्त्रित करने के कड़े उपाय नहीं किए और जैसा कि बरनी मानता है कि प्रत्येक हिन्दू के घर में टकसालें स्थापित हो गई थीं, प्रजा ने काँसे तथा ताँबे के सिक्कों को दबा लिया।
खुरासान अभियान (1330 ई.)
यह तरमाशरीन के साथ मैत्री का परिणाम था। कहा जाता है कि त्रिमैत्री संगठन (मोहम्मद बिन तुगलक, तरमाशरीन तथा मिस्र के सुल्तान) भी खुरासान के सुल्तान अबू सय्यद के विरुद्ध बनाया गया था। अभियान को सुल्तान की सेना जब तैयार हुई तो ट्रांस ऑक्सियाना में राजनीतिक परिवर्तन होने के कारण तरमाशरीन को शासक पद से हटा दिया गया। इस प्रकार यह अभियान कभी भी प्रारम्भ न हो सका।
कराचिल का सैनिक अभियान (1332 ई.)
यह सुल्तान की अगली विजय योजना थी, किन्तु इसका विनाशकारी अन्त हुआ। कराचिल कुमायूँ की पहाड़ियों में स्थित एक क्षेत्र था। सर्दी और बर्फीले तूफान में लगभग सम्पूर्ण सेना मारी गई। जो सैनिक इन प्राकृतिक आपदाओं से बच गए वे प्लेग में मारे गए। इसका सैन्य नेतृत्व खुसरो मलिक कर रहा था।
प्रशासनिक सुधार-
मोहम्मद तुगलक ने उलेमा वर्ग को प्रशासनिक कार्यों से दूर रखा। उसने उलेमा वर्ग को भी न्यायिक परिधि में ला दिया। उलेमा के अलावा उसने अन्य वर्ग को भी काजी का पद प्रदान किया।
मोहम्मद तुगलक ने कृषि की उन्नति के लिए एक नवीन विभाग खोला जिसके लिए नए मन्त्री अमीर-ए-कोही को नियुक्त किया। इसने सर्वप्रथम अकालग्रस्त लोगों के लिए अकाल संहिता तैयार करवाई।
सिंचाई के लिए सैंकडों कुएँ खुदवाए तथा अकालग्रस्त कृषकों को कृषि ऋण (तकावी) प्रदान किया गया। इसके समय मंगोलों का एकमात्र आक्रमण 1828-29 ई. में तरमाशरीन के नेतृत्व में हुआ। इसामी के अनुसार मेरठ के पास सुल्तान की सेना ने उसे पराजित किया।
विद्रोह-
मोहम्मद बिन तुगलक के समय सबसे अधिक (चौंतीस) विद्रोह हुए जिसमें सत्ताइस विद्रोह अकेले दक्षिण भारत में हुए। उसके काल के प्रमुख विद्रोह हैं-दक्षिण में बहाउद्दीन गुरशस्प, मुल्तान में बहरामकिश्लू तथा बंगाल में गयासुद्दीन आदि।
सांस्कृतिक योगदान-
मोहम्मद बिन तुगलक के अमीर वर्ग में खानदानी अमीरों के अतिरिक्त कई जातियों के लोग थे, जिनमें मुख्यत: मंगोल, विदेशी तथा हिन्दू भी थे। उसके उदारवादी विचारों का प्रमाण हमें कुछ जैन परम्पराओं में मिलता है, जिसके अनुसार उसने जैन विद्वान् जिनप्रभु सूरि तथा राजशेखर का स्वागत किया। इसामी के अनुसार सुल्तान हिन्दुओं के होली और अन्य त्योहारों में हिस्सा लेता था। नगर कोट पर आक्रमण के अवसर पर उसने ज्वालामुखी के देवी मन्दिर को नष्ट नहीं किया। हिन्दुओं को उसने सम्मानित पदों पर नियुक्त किया। .
अपने शासनकाल के अन्तिम समय में जब सुल्तान मोहम्मद तुगलक गुजरात में विद्रोह को कुचल कर सिन्ध की ओर बढ़ा तो मार्ग में थट्टा के निकट गोण्डाल पहुँचकर वह गम्भीर रूप से बीमार हो गया और यहाँ पर सुल्तान की 20 मार्च, 1351 को मृत्यु हो गई। इस पर अब्दुल कादिर बदायूँनी कहता है कि "सुल्तान को उसकी प्रजा से और प्रजा को सुल्तान से मुक्ति मिल गई।"
फिरोजशाह तुगलक (1351-1388 ई.)
1351 ई. में थट्टा में मोहम्मद तुगलक की मृत्यु के पश्चात् उसका चचेरा भाई फिरोजशाह तुगलक दिल्ली की गद्दी पर बैठा। उसके सामने ऋणग्रस्त किसानों का असन्तोष; साम्राज्य के विघटन की समस्या; राज्य का खाली खजाना तथा अमीर वर्ग का असन्तोष आदि समस्याएँ थीं।
उसने मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा प्रदत्त समस्त ऋणों (तकावी) को माफ कर दिया। दण्ड संहिता को संशोधित करके दण्डों को अधिक मानवीय बनाया तथा सुल्तान को भेंट देने की प्रथा को समाप्त कर दिया।
उसने कर प्रणाली को धार्मिक या मजहबी स्वरूप प्रदान किया और कम-से-कम तेईस प्रचलित करों को समाप्त करके इस्लामी शरियत कातून द्वारा अनुमति प्राप्त केवल चार करों-खराज) जकात) जजिया और खुम्स को आरोपित किया। अपने मजहबी उत्साह या धर्मानष्ठा को प्रदर्शन करने के लिए उसने ब्राह्मणों पर भी जजिया कर लगाया।
नहर प्रणाली के निर्माण के बाद उसने उलेमा की स्वीकृति के पश्चात् हाब-ए-शर्ब नामक सिंचाई कर भी लगाया, जो भूमि की उपज का 10% होता था। उसने नियन्त्रणाधीन फलों के 1200 बाग लगाए। उसने सरकारी पदों (सैनिक तथा असैनिक) को वंशानुगत बनाया तथा अधिकतर सैनिको को वेतन के बदले जागीरें देने की प्रथा को पुनर्जीवित किया
फिरोज तुगलक ने कुछ नए प्रकार के सिक्के चलाए। उसने शसगनी ने (चाँदी) नामक एक सिक्का चलाया जो 6 जीतल के बराबर होता था उसने अद्दा नामक एक सिक्का भी चलाया जो मिश्रित धातु का (चाँदी व ताँबा) होता था, जो आधा जीतल के बराबर होता था। उसने विख नामक एक सिक्का चलाया। वह भी मिश्रित धातु का होता था वह 1/4 जीतल के बराबर होता था।
अफीफ के अनुसार, सुल्तान ने एक घुड़सवार को अपने खजाने से एक टंका दिया, ताकि वह रिश्वत देकर अर्ज में अपने घोड़े पास करवा सके। ख्वाजा हिसामुद्दीन के एक अनुमान के अनुसार फिरोज सरकार की वार्षिक आय छ: करोड़ पचहत्तर लाख टंका थी, जबकि अकेले सेना मन्त्री वशीर (जिसने अपना प्रारम्भिक दौर सुल्तान के एक दास से प्रारम्भ किया था) के पास तेरह करोड़ टंका धन दौलत थी।
सांस्कृतिक योगदान
फिरोजशाह के शासनकाल में खिज्राबाद एवं मेरठ से अशोक के दो स्तम्भ लेखों को लाकर दिल्ली में स्थापित किया गया। अपने कल्याणकारी कार्यों के अन्तर्गत फिरोज ने एक रोजगार दफ्तर एवं मुस्लिम अनाथ स्त्रियों, विधवाओं एवं लड़कियों की सहायता हेतु एक नए दीवान-ए-खैरात नामक विभाग की स्थापना की। -
उसने फिरोजाबाद में एक मदरसे का निर्माण भी कराया। इसने इल्तुतमिश द्वारा निर्मित हौज-ए-शिम्सी और अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित हौज-ए-खास की मरम्मत करवाई। उसने कुछ नए नगरों का निर्माण कराया- फतेहाबाद, फिरोजाबाद, हिसार, फिरोजा, फिरोजपुर और जौनपुर। .
फिरोज फिरोज को इतिहास एवं चिकित्साशास्त्र में रुचि थी। संस्कृत में लिखे गए ग्रन्थों का उसने फारसी में अनुवाद कराया। उसने ज्वालामुखी मन्दिर के पुस्तकालय से लूटे गए तेरह सौ ग्रन्थों में से कुछ का फारसी में विद्वान् अलाउद्दीन द्वारा दलायले फिरोजशाही नाम से अनुवाद करवाया। दलायले फिरोजशाही आयुर्वेद से सम्बन्धित ग्रन्थ था।
फिरोज ने अपनी आत्मकथा फतूहात-ए-फिरोजशाही की रचना की, जबकि 'सीरत-ए-फिरोजशाही की रचना किसी अज्ञात विद्वान् द्वारा की गई।
बरनी ने फतवा-ए-जहाँदारी एवं तारीख-ए-फिरोजशाही की रचना की। इस काल में भवन निर्माण को काफी प्रोत्साहन मिला। उसने समय जानने के लिए ताश घडियाल नामक यन्त्र का भी प्रचलन किया था।
फिरोज तुगलक की तुष्टीकरण की नीति अन्त में साम्राज्य के विघटन के लिए जिम्मेदार हो गई। 1338 ई. में फिरोज तुगलक की मृत्यु हो गई।
फिरोज को मध्यकालीन भारत का पहला कल्याणकारी निरंकुश शासक कहा जाता है। फिरोज ने अपने को खलीफा का नायब पुकारा और अपने सिक्कों पर अलाउददीन खलीफा का नाम अंकित करवाया। हेनरी इलियट और एलिफिन्स्टन ने फिरोज को सल्तनत युग का अकबर कहा है।
अली गुरशास्प जलालुद्दीन का भतीजा तथा दामाद था। आगे वही जलालुद्दीन के रूप में विख्यात हुआ। जलालुद्दीन ने उसे कडा मानिकपुर की सूबेदारी दी थी।
मौहम्मद तुगलक के समय में चीन, ईरान, इराक, ख्वारिज्म आदि के साथ राजदूती का आदान-प्रदान हुआ जिससे सल्तनत की प्रतिष्ठा बढ़ी और विदेशों से आर्थिक एवं सांस्कृतिक सम्पर्क में वृद्धि हुई।
फिरोजशाह के उत्तराधिकारी
फिरोज का उत्तराधिकारी उसका पुत्र तुगलक शाह था, जो गयासुद्दीन तुगलक द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठा। अपने राज्यारोहण के दो वर्ष भीतर ही वह षड्यन्त्रों का शिकार हो गया। उसके बाद अमीरों के दो गुटों ने दो अलग व्यक्तियों को शासक बनाया। ये थे नासिरुद्दीन महमूद और अबू बकर, फिर थोड़े काल के लिए हुमायूँ शासक हुआ और अन्त में नासिरुद्दीन महमूद शासक हुआ।
सुल्तान नासिरुद्दीन के शासनकाल में मध्य एशिया के महान् मंगोल सेनानायक तैमूर ने 1398 ई. में भारत पर आक्रमण किया। नासिरुद्दीन महमूद गुजरात भाग गया और तैमूर ने उत्तर भारत को लूटा। अमीर तैमूर के आक्रमण से जो अव्यवस्था उत्पन्न हुई, उसका लाभ उठाकर बहुत सारे क्षेत्र स्वतन्त्र हो गए। >
सैय्यद वंश (1414-1451 ई.)-Sayyad Vansh
सल्तनत कालीन समस्त राजवंशों में खिलजियों के बाद सैय्यदों का शासन काल (1414-51 ई.) सबसे कम अर्थात् मात्र 37 वर्षों तक रहा। इस वंश का संस्थापक खिज्र खाँ था। सैय्यद वंश के कुल चार शासक हुए। सैय्यद वंश के विषय में जानकारी का एकमात्र स्रोत याहिया बिन अहमद सरहिन्दी की पुस्तक तारीख-ए-मुबारकशाही है। J
खिज्र खाँ (1414-1421 ई.)
सैय्यद वंश के संस्थापक खिज्र खाँ ने मंगोल आक्रमणकारी तैमूर को सहयोग प्रदान किया था और उसकी सेवाओं के बदले तैमूर ने उसे लाहौर मुल्तान एवं दिपालपुर की सूबेदारी सौंपी। तैमूर के भारत से वापस जाते ही खिज्र खाँ ने स्वयं को उचर पश्चिमी भारत में तैमूर का वायसराय घोषित करके शासन प्रारम्भ किया।
खिज्र खाँ ने सुल्तान की उपाधि नहीं धारण की। वह रैयत-ए-आला की उपाधि से ही सन्तुष्ट रहा। उसने अपने सिक्कों पर तुगलक शासकों का ही नाम रहने दिया। मंगोलों का खुतबा पढ़वाया।
उसने एक सम्प्रभुत्ता सम्पन्न शासक के रूप में शासन नहीं किया अपितु वह तैमूर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी शाहरुख के प्रतिनिधि या डिप्टी के रूप में शासन करने का दिखावा करता रहा।
मुबारक शाह (1421-1434 ई.)
मुबारक शाह (1421-1434 ई.) ने शाह की उपाधि धारण की,
अपने नाम से खुतबा पढ़वाया और अपने चलवाए। याहिया बिन सरहिन्दी को संरक्षण प्रदान किया। उसके ग्रन्थ तारीख ए-मुबारकशाही मी मुबारक शाह के शासनकाल के विषय में जानकारी मिलती है।
1420 ई. में कश्मीर के गृहयुद्ध में उसने जैबुलाआब्दीन का पक्ष में लिया और उसे गद्दी पर बैठाने में सहायता की। वह सैय्यद वंश का सबसे योग्यतम शासक था। यमुना नदी के किनारे उसने मुबारकबाद नामक नगर बसाया था।
मोहम्मद शाह (1434-1443 ई.)
मुबारक शाह के बाद उसका दत्तक पुत्र मोहम्म्द शाह गद्दी पर बैठा। वह मुबारक शाह के भाई फरीद खाँ का पुत्र था। मोहम्मद शाह एक अयोग्य शासक सिद्ध हुआ और अपनी अयोग्यता से उसने सैय्यद वंश के पतन का मार्ग प्रशस्त किया।
अलाउद्दीन आलमशाह (1443-1451 ई.)
अलाउद्दीन आलमशाह (1443-1451 ई.) इस वंश का अन्तिम शासक था। वह विलासी प्रवृत्ति का था। इसके समय में यह कहावत लोकप्रिय हो गई- “देखो शाह-ए-आलम का राज्य दिल्ली से पालम तक।"
उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका दामाद और जौनपुर का शासक oil हुसैनशाह ने बदायू को अपने राज्य में मिला लिया। इसके साथ ही सैय्यदों को सत्ता समाप्त हो गई तथा बहलोल लोदी ने लोदी वंश के नाम से एक नए राजवंश की स्थापना की।
लोदी वंश (1451-1526 ई.)-Lodi Vansh
दिल्ली सल्तनत के राजवंशों में लोदी वंश अन्तिम था। 1451 ई. में बहलोल लोदी ने लोदी वंश के नाम से प्रथम अफगान राज्य की स्थापना की। लोदी राजवंश अफगानों की गिलजई कबीले की शाखा लोदी के शाहखेल कुटुम्ब से सम्बन्धित थे। लोदी वंश का से शासनकाल 75 वर्षों तक रहा। इस 75 वर्षीय शासन काल में तीन शासकों ने शासन किया।
अन्तिम शासक इब्राहीम लोदी को मुगल शासक बाबर ने 1526 ई. में पानीपत के प्रथम युद्ध में पराजित कर भारत में मुगल सत्ता की स्थापना की। .
बहलोल लोदी (1451-1489 ई.)
लोदी वंश का संस्थापक बहलोल लोदी था। 19 अप्रैल, 1451 को वह बहलोल शाह गाजी के नाम से दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। बहलोल लोदी की मुख्य सफलता जौनपुर (1484 ई के विरुद्ध थी। उसने हुसैन शाह शर्की को पराजित किया और उसे जौनपुर से खदेड़ दिया तथा वहाँ अपने पुत्र बरबक शाह को नियुक्त किया।
(बहलोल एक साधारण व्यक्ति था तथा तारीख-ए-दाउदी के लेखक अब्दुल्लाह के अनुसार वह कभी सिंहासन पर नहीं बैठता था। जब अपने सरदारों के साथ मिलता था।
बहलोल का अन्तिम आक्रमण ग्वालियर के विरुद्ध हुआ। वह अपने राजस्व सिद्धान्त में सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न सुल्तान के आदर्शों को अपने सम्मुख नहीं रख सका। उसने अफगान सरदारों से जनजातीय भावना के अनुकूल समान व्यवहार किया।
बहलोल ने बहलोली सिक्का चलाया, जो अकबर से पहले तक उत्तर भारत में विनिमय का मुख्य साधन बना रहा। वह धर्मान्ध शासक नहीं था। उसने हिन्दुओं के प्रति धार्मिक कट्टरता का व्यवहार नहीं किया, बल्कि राय प्रताप सिंह, राय करन सिंह, राय नरसिंह, राय त्रिलोकचन्द्र तथा राय दादू जैसे हिन्दू सरदारों को महत्त्वपूर्ण पद दिए।
सिकन्दर शाह लोदी (1489-1517 ई.)
सिकन्दर शाह का प्रारम्भिक नाम निजाम शाह था। उसने अफगान सरदारों से समानता के व्यवहार को त्याग दिया तथा सुल्तान को सर्वोच्च मानने के लिए बाध्य किया। सिकन्दर लोदी ने स्वयं कहा था 'यदि मैं अपने गुलाम को भी पालकी में बिठा दूँ तो मेरे आदेश पर मेरे सभी सरदार उसे अपने कन्धों पर उठा ले जाएंगे। यह लोदी वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक साबित हुआ। इसने बिहार को दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया।
1504 ई. में उसने राजस्थान के शासकों पर अपने अधिकार को सुरक्षित रिखने तथा व्यापारिक मार्गों पर नियन्त्रण स्थापित करने के उद्देश्य से आगरा नगर की स्थापना की। वहाँ पर उसने एक किले का भी निर्माण करवा जो बादलगढ़ का किला के नाम से मशहूर था। 1506 ई. में आरुको सिकन्दर ने राजधानी बनाया।
राज्य के हिसाब-किताब की लेखा परीक्षण प्रणाली की शुरूआत उसने खाद्यान्न करों (अनाज-कर) को समाप्त कर दिया तथा व्यापार से प्रतिबन्धों को हटा दिया जिससे लोगों की आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा मिले। सिकन्दर लोदी ने भूमि में गड़े हुए खजाने में कोई हिस्सा नहीं लिया। नाप के लिए एक पैमाना मज-ए-सिकन्दरी उसी के समय से प्रारम्भ किया गया, जो प्राय: 30 इन्च का होता था। उसने मुहर्रम और ताजिए निकालना बन्द करा दिया था। सिकन्दर लोदी ने हिन्दुओं पर जजिया कर पुन: लगा दिया। मार्मिक दृष्टि से वह असहिष्णु था।
से एक आयुर्वेदिक ग्रन्थ का फारसी में अनुवाद किया गया, जिसका नाम फरहगे सिकन्दरी रखा गया। उसके समय में गान-विद्या के एक श्रेष्ठ ग्रन्थ लज्जत-ए-सिकन्दरशाही की रचना हुई, जो भारतीय संगीत पर पहला फारसी ग्रन्थ है।
इब्राहिम लोदी (1517-1526 ई.)
सिकन्दर लोदी की मृत्यु के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र इब्राहिम लोदी 22 नवम्बर, 1517 को गद्दी पर बैठा। वह लोदी वंश का अन्तिम शासक था। इसी के समय में 1526 ई. में पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ जिसमें बाबर ने इब्राहिम लोदी को पराजित कर भारत में नए राजवंश मुगल वंश की स्थापना की इब्राहिम लोदी की मुख्य विशेषता उसका अपने अफगान सरदारों से संघर्ष था।
असन्तुष्ट सरदारों में पंजाब का शासक दौलत खाँ लोदी एवं इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खाँ ने काबुल के तैमूर वंशी शासक बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमन्त्रण दिया। अप्रैल, 1526 को पानीपत के मैदान में बाबर से युद्ध हुआ, जिसमें इब्राहिम लोदी की हार हुई। बाबर का भारत पर आक्रमण करना ही लोदी वंश के पतन का मुख्य . कारण था।
इब्राहिम लोदी की सबसे बड़ी सफलता ग्वालियर विजय थी। इसी के समय ग्वालियर अन्तिम रूप से साम्राज्य में शामिल हुआ। इब्राहिम लोदी द्वारा ग्वालियर पर आक्रमण के समय वहाँ का शासक राजा मान सिंह का पुत्र विक्रम जीत था। इसी के काल में घटोली का युद्ध हुआ, जिसमें राणा सांगा की जीत और लोदियों की पराजय हुई थी।
अफगानी की शासन-व्यवस्था राजतन्त्रीय न होकर कुलीन तन्त्रीय थी। राजत्व सिद्धान्त सरदारी की समानता पर आधारित था। योग्यता के आधार पर सरदारी के द्वारा सुल्तानी को चुने जाने का अधिकार को मानते थे। सुल्तान की प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता को स्थापित करने के लिए सिकन्दर लोदी ने तुर्की शासन में अपनाई जाने वाली अनेक राजदरबारी प्रथाओं को अपने दरबार में प्रारम्भ किया।
सुल्तान सिकन्दर पहला अफगानी था, जिसने एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न बादशाह की भाँति व्यवहार किया। अपने पिता सिकन्दर लोदी की भाँति वह भी रत्न जड़ित सिंहासन पर बैठता था तथा सुल्तान की अनुपस्थिति के समय किसी को दरबार में बैठने की अनुमति नहीं थी। वह कहा करता था कि राजा का कोई सगा-सम्बन्धी नहीं होता।
सिकन्दर लोदी 'गुलरुखी' नाम से फारसी में कविताएँ लिखता था।
दिल्ली सल्तनत और खिलाफत इस्लाम में एक राज्य-इस्लामी राज्य, ग्रन्थ-कुरान, एक धर्म-इस्लाम तथा एक जाति मुसलमानों की अवधारणा है। पैगम्बर हजरत मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् खिलाफत नामक संस्था अस्तित्व में आई। अबुबक्र मुस्लिम समुदाय के पहले प्रमुख या खलीफा बने। इस्लामी व्यवस्था में खलीफा को धर्म का संरक्षक और राजनीतिक व्यवस्था को बनाए रखने वाला समझा जाता था। उसे पूरे मुस्लिम समुदाय का संरक्षक समझा जाता था।
दिल्ली के सुल्तानों ने भी समय-समय पर खलीफा से शासन करने की सनद प्राप्त की, खलीफा का नाम सिक्कों पर खुदवाया तथा शुक्रवार की नमाज के समय खलीफा के नाम से खुतबा जारी किया। इल्तुतमिश इस मानदण्ड के हिसाब से दिल्ली का प्रथम वैधानिक सुल्तान था।
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1 Comments
Thank you a lot
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